Saturday, April 11, 2009

कविता - हरदम रोती मधुशाला

बच्चन का दौर और आज का दौर एक दम अलग है । तब प्यार था अवसाद नही था घृणा नही थी । तब हाला लावान्यमायी थी आज की तरह घृणा पैदा नही करती थी .मैंने लिखी आज की मधुशाला .आप भी पढिए
कृति krititva की विकृत हो गई जहर हो गई मधुशाला
भावः मेरे निष्पंद हो गए सूने सारे छंद HO गए
सूख गया अमृत प्याला
मन्दिर मस्जिद के झगडे ,अश्रु बहाती मधुशाला ,
आँखों के खुनी तेवर से ,सहम रही सुरभित हाला
खून के प्यासे खून पी रहे है जूनून माँ मतवाले
आँखों माँ अब प्यार नही ही घृणा और अवसाद यही है
कैसी थिरकन कैसी मस्ती बसुध है पीने वाला
किसका मन्दिर किसकी मस्जिद
यहाँ आग वहा गोली है
भ्रष्टाचारी दावानल है राजनीती की बोली है
संत म्हणतो की बकबक से तूफानों का तांडव है
पाँच पाँच के गुट मे बटकर कौरव बनते पांडव है
द्रौपदी का सा चीर बचाती छुपती फिरती मधुशाला
श्याम नही आब आने वाले जान चुकी है मधुशाला
सिक्को की खनखन मे खोया सच्चाई का रखवाला
नए दौर मे लाज लुटाती खूब रो रही मधुशाला






No comments:

Post a Comment